ङ आधिष्ठिरत तू ही तो है जो मेरा अपना है । अंतःकरण में अधिष्ठित होकर तू ही है जो मेरा हर पल क्षणङ पथङ प्रदर्शन कर रहा है । मेरी हर सांऀस की डोर तेरे ही तो हाथ में है ।परमपिता परमेश्वर तेरे हर क्षण की लीला कई रहस्यों से ओत-प्रोत जिसका कोई भी अंत नहीं है । प्रेम झझझझझझझझघङणङ,आनंद के सागर हृदय को प्रेम कुंज से पल्लवित करने वाले तुम ही तो हो । हृदय की अंतः गुफा में तुम ही तो हो , लेकिन मात्र अनुभव गम्य हो । मात्र कर्म साक्षी हो ।अंतःकरण के ज्ञानु चक्षु से अनुभवगम्य हो, भौतिक जगत के चक्षु से अदृश्य हो । जैसे गन्ने में व्याप्त मिठास को देखना नहीं हो सकता है लेकिन चूसकर खाने पर मीठा मालूम होता है वैसे ही अंतकरण में अधिष्ठित परमात्मा है जो है लेकिन भौतिक चाक्षुओऺ से दिखता नहीं ।अध्यात्म जगत में उतरने के बाद ज्यों ज्यों गहरे उतरते जाते हैं तो अनुभव होने लगता है ।परमात्मा कहीं भी नहीं है वरन वह तो हमारे स्वयं भीतर है । मात्र हमें साधना रूपी नैय्या पर आरूढ़ होना है । मार्ग काफी कठिन है लेकिन अनन्य भाव से उतरने पर यह बड़ा ही सरल ,तत्क्षण जानने योग्य हो जाता है ।
ओम नमः शिवाय ।
परमहंस राधे राम उत्तराखंड 97195 92618
Yogacharya Girish Chandra Palariya
सोमवार, 5 अगस्त 2024
आधार
जीवन क्या है ?
जीवन की पहेली को समझना बेहद कठिन है , किस पल कौन से पल क्या हो यह किसी ने भी नहीं जाना । देखने में आता है मनुष्य सोचता कुछ है और होता कुछ अतः जो कुछ भी हो रहा है उसे निरपेक्ष से भाव से देखना ही सर्वोत्तम है । हमारे कर्मों का लेखा-जोखा अनंत जन्मों से रखा गया है और वर्तमान के सुख और दुख के भोक्ता हम स्वयं के ही कर्मों के होते हैं और किस पल हमारा कौन सा कर्म प्रकट हो जाए यह हमें कदापि पता नहीं होता है । देखने में यह आता है कि जो अनेक अनेक अशुभ कर्मों को कर रहा है वह वर्तमान में बहुत बड़ी भौतिक उपलब्धियां को लिए हुए हैं और जो अपने सात्विक भाव में ईमानदारी से चल रहा है वह बेहद परेशान है यह सब कर्मों का ही खेल है लेकिन हमें याद रखना होगा हम यदि आज अशुभ कर रहे हैं तो उसका परिणाम हमें अशुभ ही प्राप्त होगा।
हमारे जीवन की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि हम जो भी कम करते हैं उसे फल की इच्छा से ही किया करते हैं लेकिन हम निष्काम भाव से जिस दिन कम करने लगेंगे तो हमें कभी भी फलों की प्राप्ति का कोई कारण न होने की वजह से लेश मात्र भी दुख नहीं होगा
बांधो यह शरीर पृथ्वी जल अग्नि वायु और आकाश तत्व के समागम का एक रूप है और जो हमें अपने प्रारब्ध के अनुसार ही प्राप्त होता है। यही पांच तत्वों के पुतले को हम शरीर कहते हैं और शरीर जब तक रहता है तो उसे जीवन कहते हैं ।
वर्तमान में जीवन की परिभाषा ही कुछ और हो चुकी है जीवन को मात्र भौतिक उपलब्धियां तक ही बांध दिया गया है जबकि भौतिक उपलब्धियां तो मात्र अपने कर्मों के फल अनुसार ही प्राप्त हो जाती है हमारे जीवन का सबसे मुख्य उद्देश्य है भगवान की प्राप्ति होना और इसके लिए हमें यत्र तत्र कहीं नहीं जाना वर्णन अपने भीतर की यात्रा करनी है और हमारे इस शरीर के भीतर ही परमात्मा का वास है।
हम जो जो अपने जीवन के रहस्यों को समझने के लिए आध्यात्मिक के पथ पर अगसर होते हैं तो क्यों क्यों हमारी कठिन परीक्षा होना प्रारंभ हो जाती है जिससे हम घबरा कर जीवन के गंभीर रहस्यों को समझने का प्रयत्न छोड़ बैठे हैं और अपने भागवत प्रताप मार्ग को भुला देते हैं ।
हमें भागवत मार्ग की प्राप्ति के लिए स्वयं अपने भीतर ही झांकना होगा संसार की कोई भी ताकत ऐसी नहीं जो हमें भगवान की प्राप्ति कर सके हां जरूर यदि सद्गुरु हमें मिल जाए तो वह हमें मार्ग तो प्रदर्शित कर सकते हैं लेकिन चलना हमें स्वयं ही होता है यदि कलयुग के इस आडंबर पूर्ण समय में कोई यह दवा करें कि मेरे पास आओ और मैं तुम्हारे दुखों को दूर करूंगा तो सावधान यह बहुत बड़ी भूल है।
हमें चलना स्वयं ही होगा साधना स्वयं ही करनी होगी कितने ही बड़े सिद्ध के पास भी आप चले जाएं मार्ग तो प्रदर्शित वह कर देंगे लेकिन साधना स्वयं करनी होगी चलाना स्वयं होगा कोई किसी के लिए कुछ भी नहीं करता है यह सत्य को हमने अपने जीवन में अवश्य समझ जाना होगा।

सदस्यता लें
संदेश (Atom)