हमारे जीवन की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि हम जो भी कम करते हैं उसे फल की इच्छा से ही किया करते हैं लेकिन हम निष्काम भाव से जिस दिन कम करने लगेंगे तो हमें कभी भी फलों की प्राप्ति का कोई कारण न होने की वजह से लेश मात्र भी दुख नहीं होगा
बांधो यह शरीर पृथ्वी जल अग्नि वायु और आकाश तत्व के समागम का एक रूप है और जो हमें अपने प्रारब्ध के अनुसार ही प्राप्त होता है। यही पांच तत्वों के पुतले को हम शरीर कहते हैं और शरीर जब तक रहता है तो उसे जीवन कहते हैं ।
वर्तमान में जीवन की परिभाषा ही कुछ और हो चुकी है जीवन को मात्र भौतिक उपलब्धियां तक ही बांध दिया गया है जबकि भौतिक उपलब्धियां तो मात्र अपने कर्मों के फल अनुसार ही प्राप्त हो जाती है हमारे जीवन का सबसे मुख्य उद्देश्य है भगवान की प्राप्ति होना और इसके लिए हमें यत्र तत्र कहीं नहीं जाना वर्णन अपने भीतर की यात्रा करनी है और हमारे इस शरीर के भीतर ही परमात्मा का वास है।
हम जो जो अपने जीवन के रहस्यों को समझने के लिए आध्यात्मिक के पथ पर अगसर होते हैं तो क्यों क्यों हमारी कठिन परीक्षा होना प्रारंभ हो जाती है जिससे हम घबरा कर जीवन के गंभीर रहस्यों को समझने का प्रयत्न छोड़ बैठे हैं और अपने भागवत प्रताप मार्ग को भुला देते हैं ।
हमें भागवत मार्ग की प्राप्ति के लिए स्वयं अपने भीतर ही झांकना होगा संसार की कोई भी ताकत ऐसी नहीं जो हमें भगवान की प्राप्ति कर सके हां जरूर यदि सद्गुरु हमें मिल जाए तो वह हमें मार्ग तो प्रदर्शित कर सकते हैं लेकिन चलना हमें स्वयं ही होता है यदि कलयुग के इस आडंबर पूर्ण समय में कोई यह दवा करें कि मेरे पास आओ और मैं तुम्हारे दुखों को दूर करूंगा तो सावधान यह बहुत बड़ी भूल है।
हमें चलना स्वयं ही होगा साधना स्वयं ही करनी होगी कितने ही बड़े सिद्ध के पास भी आप चले जाएं मार्ग तो प्रदर्शित वह कर देंगे लेकिन साधना स्वयं करनी होगी चलाना स्वयं होगा कोई किसी के लिए कुछ भी नहीं करता है यह सत्य को हमने अपने जीवन में अवश्य समझ जाना होगा।
