आज संसार में भले ही असमंजस की स्थिति बनी हुई है प्रत्येक मानव दर-दर की ठोकरें खाकर भटक रहा है हमारे भीतर हमारे अंतःकरण में जो निर्विकार सत्य स्थापित है जो हमारे प्रत्येक सांसो में चल रहा है हमारे अंतःकरण की प्रवृत्तियों को जागृत कर रहा है आज हम उसे ही भुला बैठे हैं और यत्र तत्र विचरण कर रहे हैं जबकि वास्तविकता यह है कि जो हमारे भीतर सत्य है वाणी को प्रकट कर रहा है वहीं साकार रूप में परमात्मा है लेकिन हम भूल बस यत्र तत्र मंदिरों में या कोई निराकार रूप में कोई साकार रूप में किसी भी धर्म स्थल से जुड़कर हम अपने अहंकार को ही परिभाषित कर रहे हैं जबकि संसार में जितने भी जीव हैं सबके भीतर वही तत्व समाहित है वही सत्य है। हमें अपने जीवन के सत्य को मानना ही पड़ेगा कि हम भौतिकवादी प्रवृत्तियों के लिए नहीं है कभी बहुत एकांत में गौर से सोचें कि जो हमारे भीतर वाणी को प्रकट कर रहा है वह कौन हैॽ जो हमारी सांसो को चला रहा है वह कौन हैॽ यह ही जीवन का महान सत्य है इसको जानना इसको खोजना ही हमारे मानव जीवन का लक्ष्य है लेकिन हम अपने घर परिवार स्त्री सगे संबंधी इत्यादि भौतिकवादी वृत्तियों में प्रवृत्त होकर अपने को राग द्वेष माया मोह ममता से ग्रस्त कर कर दुखी हैं।
जीवन के महान सत्य को उद्घाटित करने वाली कला को जानने के लिए हमें कहीं भी जाने की आवश्यकता नहीं है हमें आवश्यकता है तो मात्र एक का ग्रहण ध्यान की कहानी ध्यान में एकांत में बैठकर हमें स्वयं अपने आप से ही पूछना होगा कि हम कौन हैं हम क्यों इस संसार में आए हैं क्या हमारा लक्ष्य है हमारा लक्ष्य यह घर परिवार इत्यादि भौतिक वादियों प्रवृत्तियों में उलझना नहीं है वरन् स्वयं को जानना है कि हमारे भीतर इस अंतःकरण में कौन विराजमान है जो हमें क्षण क्षण जीवित रखे हुए हैं हमारी सांसो के क्रम को बनाए हुए हैं। हमारे इस मानव जीवन का सबसे बड़ा कारक सूर्य ही है सूर्य में ही सब कुछ समाहित है जब तक सूर्य है तब तक सब कुछ है सूर्य के ही द्वारा हमारे अंतःकरण की प्रवृतियां जागृत हो रही हैं।
रविवार, 28 जुलाई 2024
हम क्या हैं
अनन्त के साथ
हरि ओम नमो परमात्मने सभी आत्म शुद्धि मित्रों को सादर नमस्कार।
अनंत की यात्रा में जाने के लिए हमें बेहद एकांत की आवश्यकता होती है लेकिन हम अपने जो कर्म को कर रहे हैं उस से भागने की जरूरत नहीं है हम जहां भी हैं जैसे भी हैं जिस स्थिति में हैं हम उस स्थिति में ही उस अनंत की यात्रा की खोज कर सकते हैं ।
एकांत का मतलब यह नहीं है कि हम अपने वर्तमान से भागे हम जहां भी हैं उस स्थिति में ही एकांत को प्राप्त कर सकते हैं।
एकांत का मतलब है अपनी पंच इंद्रियों को शांत करने का भाव जो हमें ध्यान द्वारा ही प्राप्त होता है। वह हमें ध्यान के द्वारा सुगमतापूर्वक प्राप्त हो जाता है। जिसकी हमें अपने जीवन में नितांत आवश्यकता होती है । अनंत की यात्रा में जाने पर हमें अपने अस्तित्व का ज्ञान होने लगता है हमें यह ज्ञात होता है कि हम कौन सी शक्ति हैं हमारी अंतरात्मा में कौन विराजित होकर हमारी हर सांस को चला रहा है ।
अनंत की यात्रा द्वारा हमें यह भी ज्ञान होने लगता है कि भौतिकवादी सुख क्षणभंगुर है इनका कोई अस्तित्व है ही नहीं या जो हम वर्तमान में कर रहे हैं यह हमें किस्मत बन के अवश्य प्राप्त होगा लेकिन अनंत की यात्रा की खोज एक अलग विषय है और यह मात्र ध्यान के द्वारा ही परिभाषित किया जा सकता है और जाना जा सकता है ।अनंत की यात्रा का स्वाद उसी प्रकार से है जिस प्रकार गूंगा गुड़ खाने पर या मीठा खाने पर उसका आनंद का बखान नहीं कर पाता है वही अनंत की यात्रा भी है।
आनंद की यात्रा पर जाने पर हम ब्रह्मांड की अपरिमित शक्ति के द्वारा जुड़ने लगते हैं और जो ब्रह्मांड है वह स्वयं के शरीर में ही आने लगता है और हमें यह ज्ञात होने लगता है कि जो वह वह मैं हूं जो मैं हूं वह वह शिव की शक्ल ब्रह्मांड की जो एक असीम शक्ति है वह कहीं नहीं वरन स्वर्ग हमारे भीतर ही है और हमारे को हर क्षण हर पल वह आनंदित कर रही है लेकिन हम भौतिकवादी प्रवृत्तियों में आवर्त होकर अपना वर्तमान बहुत ही दुख में बना लेते हैं।
मनुष्य मात्र का एक ही उद्देश्य होना अवश्य चाहिए कि वह अनंत की खोज करें अनंत के साथ अपने को जोड़ें और अनंत के साथ ही रहे क्योंकि वह अनंत ही हमारे भीतर है हमारी पंच इंद्रियों को वही चला रहा है वही हमें हर क्षण हर पल बुद्धि दे रहा है और वही अनंत हमें सब कुछ सर्व समर्थ वान बनाता है।
उस अनंत का अपना कोई नाम नहीं है अपना कोई गुण नहीं है वह हमें हम जैसा मानते हैं वह हमें वैसा ही दिखाई देने लग जाता है ।