आज संसार में अनेक धर्मावलंबी हो गए हैं जो विभिन्न विभिन्न पंथों को मानते हैं लेकिन फिर भी परेशान हैं आधि व्याधियों से ग्रस्त हैं और अपने भले की कामना के लिए दूसरे पर विश्वास करते हैं और दूसरे के विचारों को मानते हैं। जबकि विचार देने वाला हमारे अंतःकरण में निवास करता है और वह हमें क्षण क्षण में अपने आत्म अवलोकन का अवसर दे रहा है और हम इस अवसर को नकारते हैं और अपने आत्मा की ही आवाज को अनसुना कर देते हैं ।
यदि हम अपने विचारों पर गहन दृष्टि रखते हैं तो हमें स्वयं में ज्ञात हो जाता है कि हम जैसा भी सोचते हैं, जो कुछ भी करते हैं, जैसा भी कर्म करते हैं तो हमारे अंतःकरण से एक आवाज अवश्य आती है की हम क्या कर रहे हैं सही अथवा गलत। यदि हम दूसरे को दुख देंगे तो अवश्य आवाज आती है कि हम गलत कर रहे हैं लेकिन हम उसे ही अनसुना कर के माया मोह ममता से आबाद्ध होकर सब अनसुना कर के अपना ही बुरा करते हैं और नाना विकारों को रोग शोक आदि को प्राप्त करते हैं।
मित्रों हमें यह जीवन में याद रखना पड़ेगा कि सब कुछ हमारे ही भीतर है जब तक हमारा शरीर है तब तक ही सब कुछ है और बाकी तो कुछ भी नहीं है हम जैसा करेंगे वैसा ही ले जायेंगे वैसा ही भरेंगे ।
हमारे किसी भी कर्म से यदि दूसरे की कोई हानि हो रही है या दुख पहुंच रहा है तो वह पाप है और हमारे किसी भी कर्म से यदि दूसरे को सुख की प्राप्ति हो रही है या दूसरे का पेट भर रहा है और दूसरे को संतोष प्राप्त हो रहा है तो वही धर्म है।
Om Hari Om Shiv Om
रविवार, 28 जुलाई 2024
स्वयं को जानना ही अध्यात्म है।
अपने भाग्य के निर्माता हम स्वयं हैं।
परम एकांत रम्य वातावरण में कभी शांत चित्त होकर बैठो तो अपने स्वरूप का ज्ञान होने लग जाता है। यह वही क्षण होता है जब हमें अपने आत्मस्वरूप आनंद की अनुभूति होने लग जाती है।
इस परम आनंद के ध्यान अवस्था में हमें बेहद रम्य एवं रोमांचित करने वाले अनुभव प्राप्त होने लगते हैं और हमें यह ज्ञात होने लग जाता है कि हम जैसा कर्म करते हैं वैसा ही हमें फल प्राप्त होता है।
दुनिया की कोई भी ताकत हमें हमारे कर्म फलों को प्राप्त करने से नहीं रोक सकती है हम अच्छा करेंगे तो हमारे साथ अच्छा ही होगा और हम बुरा करेंगे तो हमारे साथ बुरा ही होगा। जिस प्रकार हम धरती से कोई गेंद ऊपर की ओर उछाते हैं तो वह दुगनी गति से नीचे की ओर ही आती है वही सिद्धांत कर्म गति, कर्म कर्म फल प्राप्त करने पर भी निर्धारित होता है।
हम अपने दुखों के अंत के लिए चाहे दुनिया के कितने बड़े उपदेशक, संत महात्मा, धर्म॒ उपदेशक व्यास आदि आदि अनेकों अनेकों के पास जाऐं लेकिन हमारे बुरे कर्म फल को कोई काट ही नहीं सकता है। साक्षात भगवान हरिनारायण भी धरती पर उतर आए तो वह भी हमारे कर्म फल के विधान को काट नहीं सकते हैं ।हम जैसा करते हैं हमें वैसा ही प्राप्त होता है और वही हमारे भाग्य का निर्धारण करता है ।
भाग्य नामक चीज़ हमारे कर्मों का ही विधान है हम करते खुद हैं और लेकिन उसे भाग्य का नाम दे देते।