रविवार, 28 जुलाई 2024

स्वयं को जानना ही अध्यात्म है।

आज संसार में अनेक धर्मावलंबी हो गए हैं जो विभिन्न विभिन्न पंथों को मानते हैं लेकिन फिर भी परेशान हैं आधि व्याधियों से ग्रस्त हैं और अपने भले की कामना के लिए दूसरे पर विश्वास करते हैं और दूसरे के विचारों को मानते हैं। जबकि विचार देने वाला हमारे अंतःकरण में निवास करता है और वह हमें क्षण क्षण में अपने आत्म अवलोकन का अवसर दे रहा है और हम इस अवसर को नकारते हैं और अपने आत्मा की ही आवाज को अनसुना कर देते हैं ।
      यदि हम अपने विचारों पर गहन दृष्टि रखते हैं तो हमें स्वयं में ज्ञात हो जाता है कि हम जैसा भी सोचते हैं, जो कुछ भी करते हैं, जैसा भी कर्म करते हैं तो हमारे अंतःकरण से एक आवाज अवश्य आती है की हम क्या कर रहे हैं सही अथवा गलत। यदि हम दूसरे को दुख देंगे तो अवश्य आवाज आती है कि हम गलत कर रहे हैं लेकिन हम उसे ही अनसुना कर के माया मोह ममता से आबाद्ध होकर सब अनसुना कर के अपना ही बुरा करते हैं और नाना विकारों को रोग शोक आदि को प्राप्त करते हैं।
       मित्रों हमें यह जीवन में याद रखना पड़ेगा कि सब कुछ हमारे ही भीतर है जब तक हमारा शरीर है तब तक ही सब कुछ है और बाकी तो कुछ भी नहीं है हम जैसा करेंगे वैसा ही ले जायेंगे वैसा ही भरेंगे ‌।
   हमारे किसी भी कर्म से यदि दूसरे की कोई हानि हो रही है या दुख पहुंच रहा है तो वह पाप है और हमारे किसी भी कर्म से यदि दूसरे को सुख की प्राप्ति हो रही है या दूसरे का पेट भर रहा है और दूसरे को संतोष प्राप्त हो रहा है तो वही धर्म है।
          Om Hari Om Shiv Om

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें