हमारे जीवन का लक्ष्य भौतिकवादी परिवर्तनों में आ सकते हो ना नहीं है वरन् हमारे जीवन का लक्ष्य स्वयं को जानना है जो हमारे अंतःकरण के भीतर विराजमान है पल प्रतिपल हमारी सांसो को चला रहा है उसे ही जानना हमारे जीवन का महान लक्ष्य है लेकिन हम अपने भौतिकवादी गतिविधियों के कारण उस परम सत्य को आज भुला बैठे हैं जिसकी वजह से हमें राग द्वेष विषाद इत्यादि अनेक अनेक अधि भौतिक तापों का सामना करना पड़ रहा है । अपने जीवन का लक्ष्य निर्धारित करने के लिए हमें कहीं भी नहीं भागना है वरन हम जिस भी कर्म क्षेत्र में प्रवृत्त हैं उस कर्म क्षेत्र में प्रवृत्त होकर पूरे ईमानदारी एवं निष्ठा से अपने कर्तव्य का पालन करते हुए ही हमारा उद्धार होता है हम जो भी कम रह कर रहे हैं उसको कुशलता के साथ करना ही हमारा सर्वप्रथम धर्म है आप चाहे किसी आश्रम मठ किसी धार्मिक स्थान या किसी की भी शरण में चले जाएं लेकिन हमारा उद्धार स्वयं हमारे ही कर्मों द्वारा होता है या हमें अपनी जिंदगी में मानना ही पड़ेगा कि दुनिया की कोई भी ताकत किसी के लिए कुछ भी नहीं करती है वरन हम जैसा करते हैं हमारे ही कर्मा काफल हमें दुगनी चौगुनी कई गुना गति से प्राप्त होता है लेकिन हम हम यह सोचते हैं कि वह या दूसरा हमारे लिए यह कर रहा है या वह कर रहा है पर हमारे लिए कोई भी कुछ नहीं करता है हम जैसा करते हैं वैसा ही हमें प्राप्त होता है यह संसार का अकाट्य सिद्धांत है इसे हमें मानना ही पड़ेगा इसे हमें जानना ही पड़ेगा हम जैसा करेंगे वैसा ही भरेंगे।
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