*ॐ नमः शिवाय...🌹*
*❤शुभप्रभात-शिवप्रभात❤*
प्रिय आत्मन मित्रो...!
जहाँ पर धर्म की सीमा-XYZ समाप्त होती है, वहीं से अध्यात्म यात्रा की सीमा-ABC शुरू होती है।
धर्म सदा ही ईश्वर को बाहर खोजता है, जबकि ईश्वर भीतर का विषय है। बाहर जाकर केवल स्वयं को खोया तो जा सकता है पर स्वयं की खोज भीतर से ही शुरू होगी।
धर्म बहुत आसान विषय है, और कोई भी इंसान दुर्गम-कठिन कार्य नहीं करना चाहता। अध्यात्म में मन की मृत्यु होती है और मन के मारे बिना, इस मैं-मैं के अहंकार के विदा हुए बिना कोई भी आत्मसाक्षात्कार को उपलब्ध नहीं हो सका।
समाज में रहते हुए हम एक नेक इंसान, धार्मिक इंसान, अच्छे प्रवक्ता, ज्ञानी भक्त बन सकते हैं और बनने के बाद वाहवाही भी मिलेगी, ये सभी रास्ते परमात्मा की आड़ में वाहवाही को पाने के ही रास्ते हैं
किन्तु जिसने मिटना है, उसे तो अलग होना ही पड़ता है। भीड़ में रहना आसान है, पर भीड़ से निकलकर स्वयं के साथ होना बहुत ही मुश्किल है।
किन्तु उन मुश्किल-कठिन रास्तों पर भी अनेकों निकले हैं, और निकल वही पाता है जिसकी समस्त वासनाएं विदा हो गई हों, जिसके प्राणों में अब केवल परमात्मा ही बसना चाहता है, वही अपने जीवन को दांव पर लगाता है और परमात्मा के साथ आर या पार की बाजी लगाता है, उस बाजी में परमात्मा की कभी भी जीत नहीं हुई, परमात्मा अपने भक्त को ही जीता कर खुद हार जाता है और उसके सामने प्रकट हो जाता है। किंतु परमात्मा भी एक बार अंतिम परीक्षा ले लेता है कि वह सच में मुझे ही चाहता है या मुझसे संसार चाहता है।
परमात्मा के मार्ग पर सभी चले हैं चाहे वो राजा हो या फिर रंक। किन्तु एवरेज में अधिकतर राजा ही उसके दरबार तक पहुंच पाए।
जितने भी दरिद्र नारायण चले, उसमें से कुछेक अपवाद को छोड़कर, शेष सभी परमात्मा के दिये हुए कोई वैभव में, कोई नारी में, कोई प्रसिद्धि में, कहीं न कहीं रुक ही गया।
किन्तु जितने भी राजकुमार चले, अधिकांश उसके द्वार तक पहुंच गए। राजकुमार के लिए अब कुछ पाना और छोड़ना शेष न रह गया। इतिहास भी इसका साक्षी है।
बुद्ध होने के लिए अंतिम जोखिम उठाना ही पड़ता है। वरना महावीर, मीरा, बुद्ध,राबिया, शबरी जैसे लोग घर में बैठे बैठे अपनी प्यास को परमात्मा बना लेते।
भक्ति घर में रहकर की जा सकती है क्योंकि भक्ति में 2 मौजूद हैं, और 2 के साथ रहने में कोई असुविधा नहीं। किन्तु जब बात ध्यान की आती है, वहां तुम अकेले हो।
सुख तब तक प्रिय है जब तक आनंद का अमृत नहीं चखा।
कहने को स्वयं का मार्ग, बुद्धत्व का मार्ग दुर्गम है। किंतु उससे सुगम मार्ग इस अस्तित्व में नहीं है। तन, मन, धन, आत्मा से अपना सर्वस्व उसे अर्पण करके ध्यान में उतरना पड़ता है। समय लगता है मन की मृत्यु में। क्योंकि मन आदी हो चुका है भीड़ में, सुखों में रहने का, दुसरो पर आश्रित रहने का। इधर मन विदा हुआ, उधर मन से निर्मित सब संसार विदा हुआ।
ज्ञान को-बुद्धत्व को उपलब्ध होने के बाद जब कोई भी लौटा तो उसके पास कोई मन नहीं रह गया। जब मन ही नहीं तो किसी भी प्रकार के संसार का निर्माण भी सम्भव नहीं। फिर सारी धरती अपनी, सारि सृष्टि अपनी, न कोई अपना न कोई बेगाना। जब ऐसी स्थिति उपलब्ध हो जाती है केवल एक नीला आकाश-छत रह जाती है, जिसकी अब कोई दीवार नहीं है, कोई भी जीवात्मा, कहीं से भी उसके पास आ सकती है।
जब भी दीवारों का निर्माण होगा, तो मेरी अलग पहचान होगी, मेरे अपने चेले-शिष्य-- संसार भी बनेगा।
धर्म सदा चारदीवारी में पलता है। और अध्यात्म एक आकाश के नीचे।
बुद्ध, महावीर, मीरा जैसे महापरुषों के उदाहरण देने में मजा आता है, किन्तु जब उनकी राह पर चलना हो तो केवल एक बात सामने आती है कि परमात्मा तो कण कण में है, वो तो हमारे घर में, हमारी दुकान पर भी है, परमात्मा मार्किट में भी मिलता है। ऐसा इसलिए कहते हैं हमारे भीतर उन महापुरुषों जितनी हिम्मत नहीं है, प्यास नहीं है।
अगर ये महापुरुष एक बार स्वयं को उपलब्ध होने के लिए समाज से अलग हुए तो अवश्य कोई कारण होगा, अनेको-अनेको ऋषि-मुनि अपने घरों से अलग होकर जंगलों में, हिमालय में तप करते हैं तो कोई कारण होगा। हम सभी जिनकी बाते करते हैं, वह सभी हमसे कहीं ज्यादा बुद्धिजीवी रहे होंगे, तभी हम उनके आदर्शों को पढ़ते हैं।
सत्य को स्वीकार कर लेना भी एक तप है।
अधर्म से धर्म की ओर, फिर धर्म से अध्यात्म-स्वयं की ओर फिर स्वयं से भी परे अनन्त की ओर।
बुद्ध होना है तो बड़ी तयारी करिये, कुएं से निकलकर महासागर की ओर बढिए----
प्रिय आत्मन मित्र--आपका सदा ही मंगल-कल्याण हो🙏🏻🙏🏻🙏🏻
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