धर्म की आड़ लेकर ही आज सबसे ज्यादा कुकृत्य हो रहे हैं, व्यक्ति धर्म स्थलों से या धर्म उपदेश से जुड़कर अधिकांश अहंकार वादी और दम्भी हो जाता है क्योंकि वह अपने को साधन सिद्ध प्राप्त महापुरुषों के समकक्ष ही समझने लग जाता है और उसके अंदर मिथ्या अहंकार पुष्ट होने लगता है।
जबकि वास्तविकता ऐसी नहीं है धर्म हमें कभी भी दूसरे की मानसिक शांति को भंग करने का अधिकार नहीं देता है। जहां भी देखो जितना ज्यादा मिथ्या अहंकार या दंभ आचरण धर्म के ठेकेदारों के अंदर है उतना और कहीं भी नहीं।
हमने बड़े नजदीक से देखा है कि आश्रम जिस संस्था का नाम कहते हैं वहां अधिकांश परेशानियां पैदा करने वाला ही कर्म होता है एक बार हम दिल्ली में किसी आश्रम में सेवा करने के लिए गए और वहां एक जगह पर बैठे तो हमने देखा कि जितना भी दान लोग दे रहे थे वह उसे नशीली वस्तुओं को ही खरीद कर ला रहे थे अतः निष्कर्ष यह निकला कि लोगों के द्वारा दिया गया दान व्यर्थ जा रहा है।
आज वर्तमान में धर्म एकमात्र व्यापार रह गया है जहां रुपए पैसों धन संपत्ति का ही बोलबाला रहता है एक बार की बात है हम किसी सुप्रसिद्ध आश्रम पर भिक्षा लेने के लिए गए तो वहां हम से मना कर दिया गया लेकिन हम वहीं बैठे रहे तो हमारे बाद 1 घंटे पश्चात कुछ लोग वहां आए और उन्होंने उनसे गुरु दीक्षा की बात कही तो उन्होंने उनसे समय और आदर के साथ सब कुछ उनको बता दिया लेकिन हमारे पास कोई धन की व्यवस्था नहीं थी तो हमारा तिरस्कार ही किया गया इससे सिद्ध होता है कि आपके पास धन है तो आप सब कुछ कर सकते हैं।
परम सिद्ध वैराग्य वान महापुरुष को ही अपना गुरु बनाना चाहिए कोई भी मत आश्रम धर्म स्थान से जुड़े व्यक्ति को कदापि भी अपना ग्रुप नहीं मानना चाहिए क्योंकि वह अपनी ही माया मोह में लिप्त है तो वह हमें क्या माया मोह से दूर कर पाएगा जो स्वयं ही माया में लगा है एक-एक ईटी को जोड़ रहा है तो वह क्या हमारी माया को तोड़ेगा कदापि भी नहीं।
हमें यदि सच्ची मानसिक शांति चाहिए तो बेहद एकांत स्थान पर जाकर अपना स्वयं का आत्म अवलोकन ही करना पड़ेगा यह हमें भूल जाना चाहिए कि कोई सिद्ध महात्मा हमारे कर्मों को धो देगा जैसा हमने किया है वह हमें अवश्य भोगना ही पड़ेगा चाहे हम संसार की कितनी बड़ी भी ताकत के साथ जुड़ जाएं लेकिन अपना किया हुआ हमें अवश्य एक ना एक दिन भोगना ही है अतः अपने को सौंपने से पहले उस व्यक्ति को बहुत भली भांति परख लें जिसके साथ आप जुड़ रहे हैं।
हम एक जगह पर गए तो वहां देखा कि वहां के लोग उस आश्रम में मात्र घर गृहस्ती के पचड़े से बचने के लिए दिन-रात सेवा के नाम पर काम कर रहे हैं जबकि वहां वह लोग दूसरे को केवल मानसिक परेशानियां ही दे रहे हैं ,अनेका अनेक रूप में वह परेशानियां उत्पन्न करते हैं । वर्तमान समय में लोग धर्म से जुड़कर मात्र रुपया पैसा धन आदि की ही अभिलाषा में जुटे हुए हैं जबकि देखने में उन्होंने गेरुआ वस्त्र धारण कर लेते हैं लेकिन मन उनका अभी भी माया में ही लिप्त रहता है और अनेका अनेक माया मैं संसार को ही जोड़ने में लगे रहते हैं। अतः आध्यात्मिकता के सफर में बड़े सोच समझकर ही आगे कदम बढ़ाना चाहिए नहीं तो अर्थ का अनर्थ ही होता है और हमारे भीतर अनेका अनेक विकार जन्म लेते हैं।
परमात्मा कहीं भी नहीं है परमात्मा तो हमारे भीतर साक्षी भाव से स्वयं आत्म रूप होकर बैठा हुआ है उसे यत्र तत्र विचरण करके नहीं ढूंढा जा सकता है वह तो मात्र अनुभव गम्य है और आप जहां पर हैं अपने कर्म को करते हुए उस अनुभव को प्राप्त कर सकते हैं यदि आप सोचें कि हमें कोई अन्य उस अनुभव को प्राप्त कर सकता है तो वह कदापि भी नहीं होगा बल्कि आप एक माया में संसार में ही रचे बचे रहेंगे और दिनों दिन आपका मायावी संसार ही बढ़ेगा।
रविवार, 28 जुलाई 2024
धर्म की आड़
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