रविवार, 28 जुलाई 2024

कैसे-कैसे लोग, ऐसे वैसे हो गए। ऐसे वैसे लोग कैसे कैसे हो गये।

समय का पहिया बड़ा ही विचित्र है कब किस घड़ी क्या हो जाए दुनिया में कोई भी नहीं जानता है। जो लोग आज से बहुत पहले लोग बड़ी बड़ी अहमियत रखते थे अहंकार घोट घोट के रोम रोम में भरा हुआ था आज यह देखने को आया रहा है कि वह दाने दाने के लिए मोहताज हो गए हैं और जिन्होंने अपने मन वचन कर्म को नियंत्रण में रखकर पूरे मनोभाव से कार्य किया वह आज कहां के कहां पहुंच गए।
कहने का तात्पर्य है कि समय का चक्र कभी भी एक समान नहीं रहता है वह कभी न कभी बहुत ऊपर पहुंचे हुए को जमीन में लाकर अवश्य पटकता है।
कभी भी किसी हाल में अपनी आमदनी से ज्यादा खर्च नहीं करना चाहिए और कोई भी ऐसे कर्ज के जंजाल में हमें कदापि नहीं घोषणा चाहिए जिससे हम दिन दुगना रात चौगुना ब्याज देने में ही लग जाए ब्याज में उठाई ही रकम ही आदमी को बहुत बड़ा कंगाल बना देती है। देखने में आता है कि जो बाहरी आवरण में ही व्यस्त रहता है दिखावे में रहता है अपने खर्चों को नियंत्रण में नहीं रखता है वह चाहे कुबेर के खजाने का ही स्वामी क्यों ना हो एक ना एक दिन अवश्य कंगाली के द्वार पर खड़ा हो ही जाता है अतः हमें हर वक्त अपने खर्चे को बड़े सोच समझ कर ही करना चाहिए।
हम जिन्हें बड़े लोग कहते हैं वह वास्तव में दिल के बड़े नहीं होते हैं वह अपने नीचे से के व्यक्तियों को दिन ही नहीं समझते हैं और उनकी नजर में मात्र पैसा ही सब कुछ होता है, ऐसा लोग अपना स्वार्थ साधने के लिए कभी भी किसी को भी अपना माई बाप बना लेते हैं और वक्त निकलने के पश्चात उसे दूध में जैसे मक्खी को फेंका जाता है वैसे ही उसको अपने से दूर कर देते हैं।
दिखावे की दुनिया से सावधान रहने का सबसे सुगम मार्ग है कि हम कोई भी दोस्ती दिल की गहराइयों से नहीं बल्कि दिमाग का प्रयोग करते हुए करें। दिल और अंतरात्मा में बहुत बड़ा अंतर है दिल हमेशा भावनाओं की ओर झुकता है जबकि अंतःआत्मा वास्तविकता का भान कराती है लेकिन हम उसे अनसुना कर देते हैं, अतः हर कार्य में पहले अपने दिमाग से मोलतोल अवश्य कर लेना चाहिए क्योंकि जो धोखेबाज मित्र होता है उसे पहचानना बहुत ही कठिन कार्य है। कपटी की पहचान के लिए तो परमात्मा प्रदत्त आंखें ही चाहिए ,कपटी अपना स्वार्थ साधने के लिए कोयल की वाणी का प्रयोग तो करता है लेकिन अंदर ही अंदर कौवे की तरह होता है।
जो मात्र स्वार्थ साधने की मित्रता को करता है वह चापलूसी भरी बातों से अपने नियंत्रण में व्यक्ति को ले लेता है और उसकी जी हजूरी करने लग जाता है, लेकिन हम स्वयं यह सोचने लग जाते हैं कि यह हमारा दिन रात करके बड़ा अच्छा साथ दे रहा है लेकिन वह मित्र समाज में हमेशा गलतफहमियां फैलाने का ही कार्य करता है और एक दूसरे में भ्रांतियां फैला कर हमें समाज से दूर करने का मार्ग ही सुगम करता है और अपना उल्लू साधने लग जाता है।
लेकिन परमात्मा अपने ऊपर आश्रित व्यक्ति की हमेशा रक्षा करता है और उसकी आंखों को खोलने के लिए शिवजी ऐसे ऐसे खेल रचते हैं कि वह व्यक्ति ऐसा वैसा ही हो जाता है ।
भगवान को समझना जा साधना सरल है लेकिन कपटी को पहचानना बड़ा ही दुष्कर कार्य है वह तभी पहचाना जाता है जब उसके द्वारा कोई धोखा मिलता है।

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