रविवार, 28 जुलाई 2024

सुख आये इतराओ मत, दुख आये घबराओ मत।

ओम नमः शिवाय शिवाय नमः ॐ।
सभीआत्म विज्ञ प्रेमी मित्रों को सादर नमस्कार ।
हम जैसे हैं जहां पर हैं और जो कुछ भी हैं परमात्मा की सर्वश्रेष्ठ रचना हैं। हमारे द्वारा किए गए कर्म ही हमें सुख एवं दुख अनुभूति कराते हैं लेकिन हम सुख को तो अपने कर्म का कारण एवं दुख को दूसरों के द्वारा जनित समझने लग जाते हैं यही हमारे जीवन की महान भूल है ।

    हमें अपने जीवन के महान सत्य का यह उद्घोष करना ही होगा हम जैसा कर्म करेंगे वैसा ही हमें फल अवश्य प्राप्त होगा । यह कभी हो ही नहीं सकता कि हम अच्छा कर्म करें और हमें उसका फल बुरा मिले, हो सकता है वर्तमान में भले कर्म करने पर कुछ दुख दिखने लगे लेकिन यह उस प्रकार से है जिस प्रकार बैंक में खाते में रखा रुपया हमें हमें ही मिलता है ‌।हम जैसा इकट्ठा करेंगे वही हमें मिलेगा।
दुख आने पर हमें कदापि भी नहीं घबराना चाहिए वरन अपने भीतर हृदय में बैठे हुए साक्षात परब्रम्ह परमात्मा का ध्यान करके चिंतन करना चाहिए कि इस समस्या का निवारण किस प्रकार से होगा , सच्चे मन से पुकार करने पर हमें अपनी आत्मा के द्वारा अवश्य संदेश प्राप्त होंगे और जो बहुत ही सत्य और सटीक होंगे।
हम चाहे किसी भी धर्म जाति संप्रदाय देश काल परिस्थिति में क्यों ना हो लेकिन परमात्मा सब पर समान दृष्टि रखते हुए सबसे समान प्रेम करता है और सभी उस परमात्मा की संतान हैं।
लेकिन वर्तमान समय में आज मनुष्य अपने ही धर्म से च** हो रहा है और अपने जीवन की वास्तविकता भरा कर धर्म जाति संप्रदाय देश काल के बंधनों से बना हुआ है जबकि पूरा संसार परमात्मा की संतान है परमात्मा के द्वारा प्रदत्त है प्रत्येक प्राणी अपने कर्म फल अनुसार अपना जीवन यापन कर रहा है अतः दुख में कदापि भी घबराना नहीं चाहिए।
          जिस प्रकार हमारे जीवन में सुख आता है वैसे ही दुख भी आता है । सुख से ही दुख का जनन होता है और दुख से सुख का जनन होता है । समय आने पर हमारे जीवन में अवश्य सुख आएगा और सुख आएगा तो दुख भी अवश्य आएगा ही आएगा। लेकिन हमें दुख के समय धैर्य संयम शांति के साथ एकाग्रचित होकर गहन ध्यान में आरुढ़ हो जाना चाहिए ‌।यह गहरा ध्यान हमें नेत्रों के मध्य भृकुटी स्थान पर लगाना चाहिए ।
           आज वर्तमान समय में कई लोग दुख निवारण के नाम पर दुकानें लगाए हुए बैठे हैं ।अतः ऐसे लोगों से बेहद सावधान रहना चाहिए  ।अपने हृदय में यह गांठ बांधकर रख लेना चाहिए की संसार में कोई भी किसी के लिए कुछ नहीं कर सकता है ,हम जैसा करते हैं वैसा ही हमें प्राप्त होता है। यह परमात्मा का नियम है । हम जहां पर हैंं सर्वश्रेष्ठ हैं।    जैसे हैं ठीक हैं।
सुख आऐ इतराओ मत, दुख आऐ घबराओ मत।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें