रविवार, 28 जुलाई 2024

जीवन का सत्य - प्रकृति की गोद में।

प्रकृति की शान्त एकांत वादियों में मन की चंचलता बिल्कुल समाप्त हो जाती है । शहर के कोलाहल से दूर प्रकृति की शांत वादियों में जो आनंद की प्राप्ति होती है उस की अनुभूति मात्र अनुभव गम्य है। वह हमें कहीं भी कदापि प्राप्त नहीं हो सकती है। शहर में नाना प्रकार के ध्वनि प्रदूषण से हमारे मन एवं बुद्धि का समग्र विकास रुक जाता है और नाना प्रकार के शारीरिक एवं मानसिक विकारों का जन्म होता है ।
आत्मिक विकास के लिए हमें प्रकृति की शांत गोद में अवश्य बैठना चाहिए , जिस मां की गोद में बैठ कर हमें सुख शांति एवं मानसिक शांति का अनुभव होता है।
                 हम उस मानसिक शांति को किसी भी प्रकार से प्राप्त नहीं कर सकते हैं ।हमारे पास बेहिसाब धन संपत्ति हो जाए लेकिन जो मानसिक शांति की अनुभूति हमें प्रकृति के सान्निध्य में होती है वह कहीं भी नहीं हो सकती है । हमें जब कभी भी फुर्सत मिले तो प्रकृति के सानिध्य में अवश्य ही बैठना चाहिए जिससे हमारा मन ,बुद्धि, प्राण ,उत्साह एवं उमंग से भरपूर हो जाता है और हमें एक शांत मन प्राप्त होता है ।
         आज संसार में जितने दुख , राग, वैमनस्यता एवं विषाद हैं उन सबका कारण भौतिकवादी प्रवृतियों का बढ़ना है । जितना अधिक भौतिकवाद बढ़ेगा उतना ही संसार में प्रदूषण भी ज्यादा होगा ‌।जब-जब संसार में प्रलय हुआ, विनाश या युद्ध हुआ है इन सबका कारण हमारी भौतिकवादी प्रवृतियों का उफान में रहने ही कारण रहे हैं। जबकि जीवन की वास्तविकता यह है कि हम खाली हाथ आए थे और खाली ही हाथ जाएंगे ।हम मुट्ठी बांधकर जन्म लेते हैं और हाथ पसार कर संसार से अलविदा हो जाते हैं।
       इन सब से बचने का सबसे सुगम एवं सरल उपाय यह है हम जो भी कर्म करें निष्काम भाव से करें अपना फर्ज समझकर करें तो हम कर्मों की डोरी से नहीं बधंगे और भौतिक वाद से बचे रहेंगे।

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