रविवार, 28 जुलाई 2024

अपने भाग्य के निर्माता हम स्वयं हैं।

परम एकांत रम्य वातावरण में कभी शांत चित्त होकर बैठो तो अपने स्वरूप का ज्ञान होने लग जाता है। यह वही क्षण होता है जब हमें अपने आत्मस्वरूप आनंद की अनुभूति होने लग जाती है।
    इस परम आनंद के ध्यान अवस्था में हमें बेहद रम्य एवं रोमांचित करने वाले अनुभव प्राप्त होने लगते हैं और हमें यह ज्ञात होने लग जाता है कि हम जैसा कर्म करते हैं वैसा ही हमें फल प्राप्त होता है।
     दुनिया की कोई भी ताकत हमें हमारे कर्म फलों को प्राप्त करने से नहीं रोक सकती है हम अच्छा करेंगे तो हमारे साथ अच्छा ही होगा और हम बुरा करेंगे तो हमारे साथ बुरा ही होगा। जिस प्रकार हम धरती से कोई गेंद ऊपर की ओर उछाते हैं तो वह दुगनी गति से नीचे की ओर ही आती है वही सिद्धांत कर्म गति, कर्म कर्म फल प्राप्त करने पर भी निर्धारित होता है।
        हम अपने दुखों के अंत के लिए चाहे दुनिया के कितने बड़े उपदेशक, संत महात्मा, धर्म॒ उपदेशक व्यास आदि आदि अनेकों अनेकों के पास जाऐं लेकिन हमारे बुरे कर्म फल को कोई काट ही नहीं सकता है। साक्षात भगवान हरिनारायण भी धरती पर उतर आए तो वह भी हमारे कर्म फल के विधान को काट नहीं सकते हैं ।हम जैसा करते हैं हमें वैसा ही प्राप्त होता है और वही हमारे भाग्य का निर्धारण करता है ।
       भाग्य नामक चीज़ हमारे कर्मों का ही विधान है हम करते खुद हैं और लेकिन उसे भाग्य का नाम दे देते।
      

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