एक है संकीर्णता का मार्ग-- कुए को समुद्र मान लेना और दूसरा है विराटता का मार्ग जहाँ केवल समुद्र ही है।
साकार को निराकार में छलांग लगानी ही पड़ती है, क्योंकि दूसरा सदा ही द्वंद्व पैदा करता है। किंतु एक समय के बाद साकार इतना प्रगाढ़ हो जाता है कि छूटता ही नहीं है।
साकार से सात्विक वासनाओं का भी जन्म होता है, किंतु पता नहीं चलता। पहले प्राप्त करने की होड़ हठ होती है और जब मिल जाए तो उसे आगे देने की इच्छा पैदा होती है।
साकार का मार्ग बच्चों के खिलोनो जैसा है, बहुत जरूरी है खिलौना, पर हम बड़े हो जाते हैं खिलोनों से खेलना आदात जैसी बन जाती है। जैसे अनेकों लोग माला जपने वाली थैली को गले में टांग कर माला जपते हुए हुए जीवन भर दिखाई देते हैं।
साकार यानी हमारी अपनी स्वेच्छा से बनाई गई कल्पना। इसमें बुद्धि और हृदय दोनों साथ-साथ काम करते हैं। अगर प्रभु कृपा हो जाए तो किसी विरले की अंतिम समय मे निराकार परमात्मा में छलांग लग जाती है, उसमें भी किसी दूसरी शक्ति को बीच में उतरना पड़ता है। स्वामी रामकृष्ण परमहंस जी पर तो अंतिम समय में तोता पुरी जी की कृपा हो गई और वह काली से परे होकर परमात्मा में चले गए, क्योंकि वहां विशुद्ध हृदय था। किंतु विवेकानंद के साथ ऐसा नहीं हो पाया। वह गुरु के रहते-रहते और विदा होने के बाद भी बुद्धि में ही जीते रहे। इसी कारण से उन्होंने अपने मिशन में धर्म और अध्यात्म को बुद्धि से तोल डाला। उन्होंने सिस्टम बनाया की कोई भी जो ग्रेजुएट होगा वही हमारे मिशन में साधु बन सकता है। क्योंकि मिशन एक इंटरनेशनल व्यपार है और उसे अनपढ़ लोग नहीं चला पाएंगे। जबकि धर्म अध्यात्म के लिए भौतिक ज्ञान-विज्ञान की कोई आवश्यकता नहीं पड़ती। स्वयं रामकृष्ण जी इसके प्रमाण हैं। किंतु जिसने स्वयं उस परमात्मा की झलक न पाई हो वह दूसरों को कैसे बता सकता है। गुरु का कार्य तो किया किन्तु जब गुरु ने वापस लौटने को कहा तो उन्होंने इनकार कर दिया। क्योंकि कंचन, कामनी, कीर्ति जब किसी को डसती है तो वापस आने का रास्ता तक नहीं छोड़ती। किन्तु एक आत्मज्ञान को उपलब्ध हुआ महापुरुष कभी भी नहीं चाहेगा, कि मेरा, मेरे मिशन का, धर्म का विस्तार हो, प्रचार हो। अगर ये वासना भी भीतर रह गई तो केसा आत्मज्ञान? आत्मज्ञान की तो उपलब्धि ही तब होती है जब जीव निर्वासना हो जाता है।
--- इसलिए हमारे ऋषियों-मुनियों ने ध्यानयोग का ऐसा दिव्य मार्ग दिया, जहां केवल तुम हो, कोई कल्पना नहीं, कोई मूरत-सूरत, कर्मकाण्ड नहीं। अगर ये सब नहीं तो कोई उलझन ही नहीं। मूरत होगी, अनेकों मन्त्र, तंत्र, विधियां होंगीं, अनेको मार्ग होंगे तो कोई भी इंसान कितना ही विवेकी हो उलझ तो जाएगा ही। और एक बार उलझा तो कई जन्मों का हिसाब किताब ही खत्म।
बुद्ध जैसों ने चुना ध्यानयोग का मार्ग। साक्षी हो जाने का मार्ग। निराकार का सीधा मार्ग, जहां केवल वही है जो समस्त कल्पनाओं से परे सत्य है। जो केवल अनुभूति का विषय है। वहां ऐसा कुछ नहीं मिलता जिसके लिए कोई मिशन तैयार किया जा, शिष्य बनाए जाए और उसे आगे बाटने के लिए कोई योग्य अधिकारी नियुक्त किया जाए।
इस निराकार, अनन्त, ध्यान के मार्ग पर जो घटित होता है वह अद्भुद दिव्य है, वह आपका है, उसे आगे ट्रांसफर नहीं किया जाता। उसी को लेकर अनन्त की यात्रा पर आगे निकला जाता है।
आत्मज्ञान की उपलब्धि के बाद अपना बेगाना, करुणा, दया जैसे सात्विक गुण भी गिर जाते हैं। वास्तव में ये सभी भावनाओं में बांधने वाले बन्धन हैं। इसलिए शायद बुद्ध जब निकले तो करुणा को लांघ चुके थे वरना पत्नी, पुत्र, महल छोड़ पाना मुमकिन न होता। जागने के बाद महापुरुष लोग परमात्मा के चरणों में खड़े हो जाते हैं और प्रकृति की किसी भी घटना में कोई हस्तक्षेप नही करते।
बुद्ध जब विदा होते हैं तो एक बार फिर जन्म लेते हैं और उसी कमाई के साथ सिद्धतत्व कि यात्रा पर निकल जाते हैं। फिर आप उन्हें अपनी भावना, श्रद्धा, धूप बति प्रार्थना से पुनः उतार पाना असम्भव होता है। जब वह चाहे तभी प्रकट होते हैं आपके चाहने पर नहीं। और वह प्रकट भी तभी होते जब कोई तप करता हुआ साधक कहीं अटक जाता है तो उसकी सहायता के लिए प्रकट होते हैं। संसार की किसी भी उथल पुथल से वह प्रभावित नहीं होते।
किन्तु भगवान, भक्त, भक्ति करने वाले दिव्य लोग, ये सभी आपके भाव से बंधे होते हैं। पूरी श्रद्धा भाव से पुकारो तो ये प्रकट हो जाते हैं। कई विदा हुए सन्त, महात्मा, देवता आपके कार्य भी सिद्ध कर जाते हैं। आपने देखा ही होगा अनेको लोग झाड़फूंक करने वाले सिध्दियां करके लोगों के कामों को सुलझाते फिरते हैं।
जो बुद्ध होगा, वह निरासक्त होगा, समस्त आश्रम, आदि जैसे तामझाम से परे होगा। उसे क्या लेना देना इन ईंट लकडी पथर के सामानों से।
----- किन्तु जिसकी स्वयं की गुत्थी उलझी होगी वही दूसरों मि गुत्थी सुलझाता हुआ दिखाई देगा।
जो बुद्ध होगा वह तो साक्षी द्रष्टा होकर उस रचनाकार की रचना का आनंद लेते हुए अपने में मस्त होगा।
आया तो वेलकम, गया तो भीड़ कम।
लुबड़ी चुपुड़ी बाते, लछेदार प्रवचन, मीठे भजन ये सब वो तरीके हैं जिससे अपनी दुकान चलाने के लिए ग्राहक को बहकाया, फुसलाया जा सके। अगर अपना प्रोडक्ट बेचना है तो अनेको युक्तियां लगानी पड़ेगी।
बुद्ध जैसों के पास न तो दुकान होती है और न बेचने कोई सामान। वह तो स्वयं परमात्मा के ग्राहक बनकर उसकी ओर बढ़ते जाते हैं।
आइये, प्रिय मित्रों! बहुत हुई निंद्रा! अब तो जागे, लोटे स्वयं की ओर, अपने और परमात्मा के बीच में आने वाले सभी बिचौलियों से सावधान हो जाए। जो तुम्हे तो घरों से निकालते हैं किंतु साथ में आपसे ही अपने भव्य महल तयार करवा के आपको ही मुफ्त का चौकीदार रख लेते हैं। गुरुकार्य के नाम गोरखधंधा।
संकीर्णता से विराटता की ओर ध्यानयोग----
साकार,कल्पना से निराकार सत्य की ओर।
अगर आप भी सभी आत्मज्ञान को उपलब्ध होना चाहते हैं तो ध्यानयोग में उतरिये, साक्षी होना सीखिए।
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