प्रकृति के अनहद में,
चिड़ियों की चहचहाहट में ,
भोरों के मधुर गुंजन में ,
परमात्मा का गीत सदा ।
हर पल क्षण में परमात्मा का संगीत नया, हर एक सांस में गीत सजा,
आओ प्रकृति की गोद में बैठें,
बेहद नीरव शांत में बैठें,
जहां पल प्रतिपल अनहद गूंज रहा है। प्रकृति का आसन भी बोल रहा।
प्रेमाश्रु की धार में मतवाला ,
कोई इधर भी डोल रहा,
आनंद रस के प्याले से,
प्यारे भेद कोई खोल रहा ।
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