आत्मसिद्धि मित्रों को सादर नमस्कार।
आज हमारे चारों ओर का परिवेश हमें ही भटका रहा है । नाना प्रकार के संत महंत ग्रंथ या विचार हमें दिन रात परेशान करते हैं । हम अपने अंतःकरण के विचारों या अंतःकरण की बातों पर अमल ना करके दूसरे के दिए गए विचारों पर ही सत्य की अनुभूति प्राप्त करने का ध्यान करते हैं । जबकि वास्तविकता में ऐसा है ही नही जो हम दूसरों के द्वारा मुक्ति का साधन ज्ञान प्राप्त करलें ।
यह सत्य है कि संत ग्रंथ महंत या उपदेशक रोल नहीं है बल्कि होता है।
जिंदगी के वास्तविक घटनाओं को तो मात्र ध्यान ही दूर करता है। हमें अपना उद्धार करना है व भटकाव से बचना है तो हमें ध्यान की शरण प्राप्त करनी ही होगी। जिंदगी के महान सत्य को हमें गांठ बांधकर रखना होगा हम जैसा कर्म करेंगे वही हमें प्राप्त होगा, हम खेत में जिस प्रकार का भी बीज डालेंगे वही बीज असल फल रूप में हमें प्राप्त होगा।
भटकाव से बचने के लिए हमें अपने आत्म देव की ही उपासना एवं ध्यान करना सबसे सर्वश्रेष्ठ है नाना प्रकार के पंच पुराण निगम उपदेशक या कोई भी कथा वाचक भटकाव के ही साधन हैं क्योंकि यह सब कर्म से ही आबद्ध करते हैं और हमें मुक्ति प्राप्त करने के लिए कर्मों से मुक्त होना आवश्यक है जब हम हर प्रकार के कर्मों से मुक्त होंगे तभी ही हमें सच्चे मार्ग की प्राप्ति होगी।
हमें अपनी मुक्ति की प्रार्थना के लिए कहीं भी जाने की आवश्यकता नहीं है हम जिस धर्म में हैं जिस मार्ग में है जिस जगह में है उस उपासना पद्धति को अपनाते हुए स्वयं द्वारा अपने अंतःकरण का ध्यान करें और उस परमेश्वर से प्रार्थना करें हे प्रभु हमें सन्मार्ग दो हमें सद्बुद्धि दो हमें सत्य की अनुभूति कराओ। हमारे भीतर विराजित परमात्मा हमारी अंतःकरण की श्रद्धा पूर्ण आवाज को अवश्य ही सुनते हैं जिससे हमारे भटकाव का अंत हो जाता है और सत्य परम सत्य की अनुभूति दिनोंदिन प्राप्त होने लग जाती है।
बस हमें आवश्यकता है तो इस बात की है कि हम अपने परम ध्येय में लगे रहें।
जब तक हम समस्त मानव जाति को अपने ही स्वरूप का अंश नहीं समझेंगे और अपने ही समान नहीं समझेंगे तो हमारे अध्यात्म होने का ज्ञान बिल्कुल बेकार है वह हीरा समझकर कोयला है।
रविवार, 28 जुलाई 2024
भटकाव
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