कर्म और काम -- कहने में तो एक हैं किंतु दोनो में अंतर बहुत विशाल है।
करने की क्रिया का नाम है काम!--
भौतिक क्षेत्र हो या धार्मिक, दोनो में स्थूल देह से काम किये जाते हैं, और बनते है काम के बंधन, जिसे सभी कर्मबन्धन के नाम से पुकारते हैं। और इसी से कर्मबन्धन से निर्मित होते है जन्मों-जन्मों के पाप और पुण्य के संस्कार। इसी कर्मबन्धन संस्कार के संसार से मुक्त होना असंभव है क्योंकि जो भी क्रिया की जाएगी उससे कुछ न कुछ निर्मित तो होगा ही, फिर वह क्रिया चाहे पूजापाठ हो या कोई मन्त्र, तन्त्र या कर्मकांड या फिर कोई बिजनस। इन सबके पीछे कोई न कोई अपेक्षा जुड़ी होती है, फिर वह अपेक्षा किसी के कल्याण करने की हो या फिर अपना स्वार्थ सिद्ध करने की हो।
होने की क्रिया-घटना का नाम है कर्म!-- जब कोई इंसान होने की क्रिया में उतरता है तो फिर वह या तो साक्षी हो जाता है या फिर प्रभु को पूर्ण समर्पित हो जाता है। साक्षी और समर्पित होते ही साधक कर्मबन्धन से मुक्त होने लगता है। प्रारब्ध के कर्मों को हस्ते हुए भोगता है और प्रभु को सर्वस्व अर्पित करके या तो मस्त हो जाता है भक्तराज सुदामा की तरह या फिर साक्षी द्रष्टा हो जाता है भगवान बुद्ध की तरह। दोनो ही स्थिति में कोई काम की क्रिया नहीं हो रही। केवल होने की घटना घट रही है।
अर्थात या तो अनन्य भक्ति या केवल ध्यानयोग।
भक्ति में भी उस परमात्मा से प्रेम किया जाता है जिसे कभी देखा नहीं और द्वयं में भी स्वयं से प्रेम किया जाता है जिसे अभी तक जाना नहीं।
रविवार, 28 जुलाई 2024
कर्म और काम में अंतर
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