रविवार, 28 जुलाई 2024

लाक डाउन 2020

आज 30 मार्च को भारत में लाक डाउन का आठवां दिन हो गया है। कहने को तो यह लाक डाउन है लेकिन यह हमारी ही गलतियों का या दुष्परिणामों या खामियाजा है, क्योंकि आज हम भोग विलास के पीछे इतने अंधे हो चुके हैं कि हमें कोई भी सत्-असत् का ज्ञान ही नहीं रह गया है ।हम अपने पुरातन काल से आ रही सांस्कृतिक विरासत को भुला चुके हैं और उसका खामियाजा ही वर्तमान में भोग रहे हैं ,क्योंकि हमारे भारतवर्ष में पहले नातक, सूतक इत्यादि कई ऐसी परंपराएं थी जिसे मानते थे। जैसे लोग अंतिम संस्कार में जाते थे और नदी में ही स्नान करके वस्त्र इत्यादि बदलकर फिर घर के अंदर प्रवेश करते थे  पंचगव्य या पूर्ण शुद्धि के साथ ही प्रवेश करते थे लेकिन वर्तमान में यह हमारी परंपराएं खो गई हैं। कोई रजस्वला के हाथ का खाना ही खा रहा है, कोई नातक नहीं, कोई सूतक नहीं कोई छूत नहीं ,कोई भेद नहीं ,कोई आदमी बाहर से घूम कर आ रहा है तो वह जूते से ही पूरे घर की परिक्रमा अंदर कमरों तक कर रहा है, पहले हमारे पुरातन काल में नियम यह था कि घर के दरवाजे के बाहर आदमी हाथ मुंह धो कर पूरा नहा धोकर घर के अंदर प्रवेश करता था ।यही गंदगी धीरे-धीरे अनेक जीवाणु विषाणु का प्रवेश घर के अंदर कराकर नाना प्रकार के रोगों को उत्पन्न करवा रही है। हम पाश्चात्य जगत की अंधानुकरण की दौड़ में इतने पागल हो गए हैं कि हमें अपने सनातन धर्म की विशेषताएं नजर नहीं आ रही है ।आज का युवा वर्ग तो मानो विदेश जाने की भागमभाग में ही लगा है। उसे अपने घर की दो रोटी सकून की अच्छी नहीं लग रही है । परमात्मा एक रुप से चेतावनी दे रहा है कि अभी भी सुधर जाओ ,सुधर जाओ ,सुधर जाओ नहीं तो आने वाला वक्त इस से भी बुरा होगा ।अपने सनातन धर्म पर रहकर जो भी हमारे सनातन धर्म की परंपराएं हैं उनका पूर्ण रूप से निर्वहन अवश्य करना चाहिए।
हमारे सनातन धर्म में त्रिकाल संध्या बताई गई है ,लेकिन हम लोग उसी त्रिकाल संध्या को आज बिल्कुल विस्मृत कर चुके हैं और उसका खामियाजा वर्तमान में भोग रहे हैं क्योंकि संध्या पूजन बंदन एक ऐसी परंपरा है जिससे व्यक्ति की रोग प्रतिरोधक क्षमताओं का विकास ही होता है। हम पढ़े लिखे होने की दौड़ में इतने अंधे हो चुके हैं कि हम अपने ही धर्म अपने ही संस्कृति अपने ही विरासत की मजाक उड़ाते हैं कि इससे क्या होता है ,इससे क्या होता है लेकिन आज लोगों ने देख लिया है कि इससे क्या होता है, भारतवर्ष को पुनः सनातन संस्कृति की ओर लौटना ही होगा जो हमारे पूर्वजों ने योग ,अध्यात्म ,आयुर्वेद की खोज करके हम लोगों के लिए अप्रत्यक्ष रूप से कई नियमों को बनाया था उन्हें आज हम भुला चुके हैं।
आज देखो प्रकृति कैसे शांत भाव से मंद मंद वायु को प्रवाहित कर रही है, आसमान शायद इससे पहले इतना साफ कभी हुआ हो क्योंकि पूरे विश्व के प्रदूषण फैलाने वाले एक एक चीजें बंद हो चुकी हैं। अपने को महाशक्ति कहने वाले देश चीन, अमेरिका ,स्पेन, इटली, ब्रिटेन,ईरान, अर्थात यूरोपीय देश आज अपने रहम की भीख परमात्मा से मांग रहे हैं और भारी तबाही वहां मची हुई है।

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