रविवार, 28 जुलाई 2024

आत्मा ही परमात्मा का अंश है

हमारी आत्मा ही सर्व समर्थ सर्व आधार परब्रह्म परमात्मा का अंश है वह क्षण क्षण में सांसों के द्वारा हमें भीतरी शक्ति प्रदान कर रहा है, परमात्मा एक मात्र अनुभवगम्य ज्ञान है ,जिसे वाणी के द्वारा प्रकट किया ही नहीं जा सकता है वह एक ऐसी असीम शक्ति है जिसे मात्र जाना जा सकता है, योग के द्वारा, ध्यान के द्वारा ,मंत्र जप के द्वारा, आदि अनेका अनेक साधन है जिससे आत्मा में विराजित परमात्मा का दर्शन लाभ पड़ी आसानी से हो जाता है। वर्तमान के समय में गुरु दीक्षा के नाम पर या कुंडलिनी जागरण के नाम पर दुकानें लगी हुई है जो एक बार में गुरु दीक्षा को बांट रहे हैं जबकि वास्तविकता ऐसी नहीं है ।गुरु दीक्षा तो अवश्य देता है लेकिन वह अपने शिष्य को बहुत माझता है उसकी परीक्षा लेता है तब जाकर उसके लिए जो उपाय सर्वोत्तम होता है वह उपाय उस को देता है।
स्वअधिष्ठित  परमात्मा को जानने के लिए किसी जीवन मुक्त व्यक्ति की आवश्यकता होती है, यह जरूर ही नहीं कि वह बाबा हो या भगवा धारी हो जीवन-मुक्त तो एक गृहस्थ भी होता है। जीवनमुक्त ही परमात्मा को अनुभव गम में करा देता है क्योंकि परमात्मा को अनुभव करने के लिए हमें खुद में साधना करनी पड़ती है बिना साधना के यह ज्ञान हो ही नहीं सकता है।
गुरु तो एकमात्र हमें यह बता देता है कि हमें किस मार्ग पर चलना है और वह हमें किस प्रकार प्राप्त होगा, अतः यह कवि भुलावे में रहना ही नहीं चाहिए कि उस अखंड आत्मा के प्रेरक का ज्ञान हमें कोई दूसरा कराएगा। यह जरूर है कि उस असीम शक्ति का अनुभव अलग अलग तरीकों से अलग अलग होता है। किसी को प्रकाश रूप में, किसी को साकार रूप में, किसी को निराकार रूप में, अर्थात जो जिस भाव से उसे अपने अवचेतन मन में मानता है वह उसी भाव में अपने को जनाता भी है।
यह जरूरी नहीं कि वह अपना रूप सभी को एक समान रूप से दिखाएं वह तो अनंत सूर्य से भी ज्यादा प्रकाशित से तेजोमय है, मन बुद्धि से परे है मात्र ध्यान के द्वारा देखा समझा जाता है और अनुभव में आता है।

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