कुछ करो ,ना करो, यह मन से
अंतर्यामी कुछ तो करा ही लेगा
ह्रदय बिंदु की रश्मियों से
कुछ झलक पल ज्ञान दिखा देगा।
मेरे अंतर्यामी प्रीतम,
इस ब्रह्मामण्ड सत्ता के नायक हो,
अधिनायक हो महापालक हो
जीव की सांसो के संचालक हो।
मेरे जगत आधार प्रभु,
अब जाऊं कहां मैं और कहां,
घट भीतर तुम्हारा नूर समाया,
और नहीं है कोई उपाया।
मन वचन कर्म का हूं अनुरागी,
तुम्हारे नाम रस का हूं बैरागी,
जब अपने भीतर सत्य समाया,
क्यों दर-दर की ठोकर खाउऀ अविनाशी ।
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